एक शिक्षक-साहित्यकार के जीवनानुभवों से जन्मी मूल्यपरक कृति
कई पुस्तकें विषयों से पहचानी जाती हैं, कुछ अपनी भाषा से, और कुछ ऐसी होती हैं जिनके पीछे खड़े लेखक का जीवन स्वयं उनके अर्थ को गहरा कर देता है। डॉ. चन्द्र प्रकाश शर्मा की “अमृत्व की खोज” तीसरी श्रेणी की कृति है। इसे पढ़ते समय पाठक केवल तेईस निबंध नहीं पढ़ता; वह एक ऐसे व्यक्ति की चिंतन-यात्रा से गुजरता है जिसने शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सेवा, पत्रकारिता, रेडियो, मंच और सार्वजनिक जीवन के अनेक अनुभव देखे हैं। यही कारण है कि पुस्तक का स्वर कई बार शिक्षक का, कई बार चिंतक का, कभी संवेदनशील नागरिक का और कभी सांस्कृतिक परंपरा के प्रतिनिधि का रूप लेता है। पुस्तक की विशिष्टता उसके विषयों की संख्या से अधिक इस जीवन-संपदा में है।
डॉ. शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद के मिलक क्षेत्र में हुआ और उनका बड़ा जीवन शिक्षा से जुड़ा रहा। हिंदी, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में उच्च अध्ययन, एल.टी. प्रशिक्षण और हिंदी में पीएचडी जैसी शैक्षिक उपलब्धियाँ उनके बौद्धिक विस्तार का संकेत देती हैं। लेकिन केवल डिग्रियाँ किसी लेखक को जीवंत निबंधकार नहीं बनातीं। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने शिक्षा को पेशा समाप्त होने के बाद भी सामाजिक दायित्व माना। सेवानिवृत्ति के बाद अपने क्षेत्र में इंटर कॉलेज की स्थापना करना इस बात का उदाहरण है कि उनके लिए ज्ञान का अर्थ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, साझा प्रकाश है। “अमृत्व की खोज” में बार-बार प्रकाश, सद्भाव, समाजोपयोगिता और जिम्मेदारी की जो भाषा आती है, उसे लेखक के जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
पुस्तक का शीर्षक इस जीवन-दृष्टि का प्रतीक लगता है। अमृत की खोज को यदि शाब्दिक अर्थ से आगे बढ़ाकर देखें तो वह उन तत्वों की खोज है जो मनुष्य के जीवन को नश्वर होते हुए भी सार्थक बनाते हैं। शिक्षा, अच्छे विचार, सेवा, संस्कृति, पर्यावरण की रक्षा, राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी, आत्मिक संतुलन और समाज में सकारात्मक योगदान—ये सभी ऐसे मूल्य हैं जो व्यक्ति की आयु से आगे प्रभाव छोड़ सकते हैं। एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों में जीवित रहता है, एक लेखक अपने शब्दों में, और एक सामाजिक कार्यकर्ता संस्थाओं व कार्यों में। इस अर्थ में पुस्तक का शीर्षक लेखक की व्यक्तिगत यात्रा से भी गहरे जुड़ता है।
“सद्भावों का संदेश देती दीपावली” में दीपक का रूपक इस दृष्टि को स्पष्ट करता है। एक दीपक सूर्य नहीं, फिर भी वह अंधकार को चुनौती देता है। यही बात शिक्षक, लेखक या सजग नागरिक पर लागू होती है। हर व्यक्ति पूरे समाज को अकेले नहीं बदल सकता, पर अपने हिस्से का प्रकाश फैला सकता है। डॉ. शर्मा की भाषा इस विचार को बहुत जटिल दार्शनिक शब्दों में नहीं रखती; वे परिचित जीवन-चित्र से बात शुरू करते हैं। यह शिक्षकीय सहजता पाठक को तुरंत जोड़ लेती है। निबंध का मूल्य किसी नए प्रतीक के आविष्कार में नहीं, बल्कि पुराने प्रतीक को जीवन की वर्तमान आवश्यकता से जोड़ने में है।
लेखक के जीवन में सार्वजनिक लेखन का बड़ा अनुभव रहा है। विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में सैकड़ों संपादकीय आलेखों का प्रकाशन, आकाशवाणी से अनेक वार्ताएँ और दूरदर्शन से काव्यपाठ तथा साक्षात्कार—यह सब संप्रेषण की दीर्घ साधना का प्रमाण है। “अमृत्व की खोज” में इसका लाभ स्पष्ट है। लेखक सामान्य पाठक से बात करना जानते हैं। उनकी भाषा में वक्तृत्व की ऊर्जा और संपादकीय लेखन की स्पष्टता दोनों मिलती हैं। किसी विषय को प्रस्तावना से उठाकर उदाहरण तक ले जाना और फिर निष्कर्ष देना उनके लिए स्वाभाविक प्रक्रिया दिखाई देती है।
यह सार्वजनिक लेखन अनुभव पुस्तक की विषय-विविधता का कारण भी समझाता है। एक शिक्षक और संपादकीय लेखक समाज के अनेक प्रश्नों से प्रतिदिन सामना करता है। इसलिए डॉ. शर्मा के निबंध केवल साहित्यिक भावनाओं तक सीमित नहीं रहते। वे नदी के प्रदूषण पर लिखते हैं, पंचांग की कालगणना पर विचार करते हैं, राष्ट्रगीत के इतिहास की चर्चा करते हैं, आतंकवाद पर प्रतिक्रिया देते हैं और चुनावी राजनीति का मूल्यांकन भी करते हैं। यह विविधता कभी-कभी पाठक को चकित कर सकती है, लेकिन लेखक के व्यापक जीवन-क्षेत्र को देखते हुए स्वाभाविक लगती है।
“विलुप्त नदियों के पुनर्जीवन की उपादेयता” जैसा निबंध विशेष रूप से लेखक की स्थानीय जिम्मेदारी को सामने लाता है। वे अपने क्षेत्र की नाहल नदी की स्थिति को देखते हैं और मानव गतिविधियों से उसके प्रदूषित होने पर चिंता व्यक्त करते हैं। स्थानीय मुद्दे पर लिखना एक प्रकार का साहित्यिक साहस भी है, क्योंकि लेखक ऐसी समस्या को सार्वजनिक स्मृति में दर्ज करता है जो अन्यथा धीरे-धीरे सामान्य मान ली जाती है। जब कोई नदी नाले में बदलती है, समाज कुछ वर्षों में उस परिवर्तन का अभ्यस्त हो सकता है। साहित्य उस अभ्यस्तता को तोड़ता है और कहता है—यह सामान्य नहीं है।
भारतीय पंचांग पर उनका लेख उनकी जिज्ञासु और ज्ञानप्रधान प्रवृत्ति का दूसरा रूप है। वार, ग्रह और होरा की व्याख्या के माध्यम से वे भारतीय कालगणना की संरचना सरल रूप में पाठक तक पहुँचाते हैं। यहाँ लेखक के बहुविषयी अध्ययन का लाभ दिखाई देता है। हिंदी साहित्य के साथ समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र का अध्ययन करने वाला व्यक्ति प्रायः घटनाओं को केवल भाव से नहीं, संरचना और संबंध से भी देखता है। लेखक की वैज्ञानिकता की रुचि भी इसी बहुविषयी मानसिकता से जुड़ी प्रतीत होती है।
पुस्तक में आध्यात्मिक चिंतन भी लेखक की जीवन-दृष्टि का आवश्यक अंग है। संत-संगति, सकारात्मक ऊर्जा, शांति और स्वास्थ्य की चर्चा करते हुए वे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विश्वास व्यक्त करते हैं। यह विश्वास उनके लेखन को मूल्यपरक बनाता है। वे निरपेक्ष अकादमिक दूरी बनाए रखने का प्रयास नहीं करते; बल्कि स्पष्ट रूप से बताते हैं कि किन मूल्यों और परंपराओं को वे जीवन के लिए उपयोगी मानते हैं। आधुनिक आलोचना में लेखक की निष्पक्षता पर जोर दिया जाता है, लेकिन व्यक्तिगत निबंध की शक्ति अक्सर लेखक की ईमानदार स्थिति में ही होती है। पाठक सहमत हो या न हो, उसे एक स्पष्ट आवाज सुनाई देती है।
राष्ट्रगीत और आतंकवाद पर लिखे लेखों में यह स्पष्ट आवाज राष्ट्रीय चेतना का रूप लेती है। लेखक इतिहास के गौरव, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों और वर्तमान सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को एक निरंतरता में देखते हैं। उनकी शैली यहाँ भावनात्मक और दृढ़ दोनों है। यह पुस्तक उन पाठकों से अधिक संवाद करेगी जो साहित्य में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रश्नों को महत्त्व देते हैं। साथ ही आलोचनात्मक पाठक के लिए भी यह उपयोगी है, क्योंकि वह देख सकता है कि समकालीन हिंदी निबंधकार सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय राजनीति को किस भाषा में व्यक्त करता है।
बिहार चुनाव संबंधी अंतिम निबंध लेखक के संपादकीय व्यक्तित्व की झलक देता है। यहाँ वे चुनावी मुद्दों, विभिन्न गठबंधनों और सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों पर टिप्पणी करते हैं। इस तरह संग्रह समयातीत मूल्यों और समयबद्ध घटनाओं दोनों को साथ रखता है। यही संयोजन पुस्तक को लेखक की मानसिक डायरी जैसा आयाम देता है—कुछ निबंध लंबे समय तक समान रूप से प्रासंगिक रहेंगे, कुछ भविष्य में किसी खास समय के दस्तावेज के रूप में पढ़े जाएँगे। निबंध-संग्रह की यह मिश्रित प्रकृति उसकी मानवीयता बढ़ाती है, क्योंकि मनुष्य का चिंतन भी शाश्वत और तात्कालिक दोनों से बनता है।
डॉ. शर्मा की साहित्यिक यात्रा भी इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में महत्त्वपूर्ण है। “गूंजते शब्द”, “पथरीली राहें”, “गगन में आवाज”, “फूल बने शूल”, “दस्तक” और “अमृत्व की खोज” जैसी कृतियाँ बताती हैं कि वे लगातार लेखन में सक्रिय रहे हैं। अनेक साहित्यिक और सामाजिक सम्मान, सार्वजनिक समारोहों में मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता तथा हिंदी से जुड़े संस्थागत दायित्व उनके साहित्यिक जीवन की व्यापकता को दर्शाते हैं। पुरस्कार स्वयं किसी पुस्तक की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं होते, लेकिन वे यह अवश्य दिखाते हैं कि लेखक का सार्वजनिक साहित्यिक संवाद लंबे समय से जारी है। “अमृत्व की खोज” उसी दीर्घ यात्रा की परिपक्व अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ी जा सकती है।
भाषा पर आएँ तो इसकी सबसे बड़ी विशेषता पहुँच है। लेखक गंभीर विषयों को ऐसी हिंदी में प्रस्तुत करते हैं जो पाठक को लगातार शब्दकोश देखने के लिए बाध्य नहीं करती। यह विशेषता वरिष्ठ पाठकों के साथ युवा विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी है। हिंदी निबंध की शिक्षण परंपरा में सरल, सुव्यवस्थित और उदाहरणप्रधान गद्य का विशेष स्थान है। इस पुस्तक के कई निबंध कक्षा में चर्चा, भाषण, वाद-विवाद या लेखन अभ्यास के लिए आधार बन सकते हैं।
फिर भी संपादकीय स्तर पर पुस्तक को और सुंदर बनाया जा सकता है। कई निबंधों के शीर्षक लंबे हैं और उन्हें संक्षिप्त करने से स्मरणीयता बढ़ सकती है। लेखक की अपनी समीक्षा में भी इस संभावना की ओर संकेत किया गया है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक और ऐतिहासिक विषयों के साथ संदर्भ-सूची जोड़ने से पुस्तक की विश्वसनीयता और अध्ययन-मूल्य बढ़ेगा। यदि भविष्य के संस्करण में प्रत्येक निबंध के अंत में दो-तीन पंक्तियों का “विचार हेतु” खंड या प्रश्न जोड़े जाएँ, तो शिक्षक-लेखक की पहचान के अनुरूप पुस्तक विद्यार्थियों के लिए और अधिक संवादात्मक बन सकती है।
“अमृत्व की खोज” को पढ़ने का सबसे उपयुक्त तरीका शायद लगातार एक बैठक में समाप्त करना नहीं, बल्कि प्रत्येक निबंध के बाद थोड़ा ठहरना है। संग्रह की प्रकृति ऐसी है कि विषय बार-बार बदलते हैं। दीपावली के बाद नदी, नदी के बाद कालगणना, फिर राष्ट्रीय इतिहास या समकालीन राजनीति—हर लेख नया मानसिक संदर्भ मांगता है। यदि पाठक इसे धीरे-धीरे पढ़े तो पुस्तक के पीछे मौजूद जीवन-दृष्टि अधिक स्पष्ट होती है: मनुष्य को अपने भीतर और बाहर दोनों संसारों के प्रति सजग रहना चाहिए।
यही सजगता पुस्तक की सबसे मूल्यवान विरासत है। लेखक का जीवन शिक्षा और समाज सेवा से जुड़ा रहा, और पुस्तक भी पाठक को निष्क्रिय ज्ञान नहीं देती; वह सक्रियता की ओर संकेत करती है। अपने भीतर प्रकाश जगाना, प्रकृति की रक्षा करना, संस्कृति को समझना, इतिहास को याद रखना, राष्ट्र के प्रश्नों पर विचार करना और समाज में उपयोगी भूमिका निभाना—इन सभी को एक साथ पढ़ें तो “अमृत्व” का अर्थ उभरने लगता है। वह मृत्यु से बचने का चमत्कार नहीं, बल्कि ऐसे कार्य और विचार हैं जो व्यक्ति के बाद भी अर्थ रखते हैं।
इस दृष्टि से “अमृत्व की खोज” केवल डॉ. चन्द्र प्रकाश शर्मा की नई गद्य कृति नहीं, उनके जीवन-अनुभवों का सार-संग्रह है। इसमें शिक्षक की स्पष्टता, साहित्यकार की संवेदना, संपादकीय लेखक की तात्कालिकता, सामाजिक कार्यकर्ता की जिम्मेदारी और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़े व्यक्ति का विश्वास एक साथ दिखाई देता है। यही बहुआयामी स्वर इसे विशिष्ट बनाता है। पुस्तक हिंदी निबंध के उन पाठकों के लिए विशेष आकर्षक होगी जो साहित्य को जीवन से अलग कला नहीं, बल्कि जीवन को समझने और बेहतर बनाने का माध्यम मानते हैं। “अमृत्व की खोज” अपने पाठक से यही आग्रह करती है—जो स्थायी है उसे बाहर किसी चमत्कार में नहीं, ज्ञान, सेवा, सद्भाव और जिम्मेदार जीवन में खोजिए।